जब हम भक्ति योग की बात करते हैं, तो कई बार मन में पूजा, मंदिर, कीर्तन या ध्यान की छवियाँ आती हैं। परंतु भक्ति का एक बहुत सरल, गहरा और अद्भुत अंग है—श्रवणम। संस्कृत में “श्रवणम” का अर्थ है सुनना। केवल कानों से सुनना नहीं, बल्कि हृदय से ग्रहण करना। भगवान के नाम, गुण, लीला, शिक्षाएँ और भक्तों के अनुभवों को प्रेमपूर्वक सुनना ही श्रवणम है।
भक्ति परंपरा में कहा गया है कि श्रवणम आत्मा के लिए अमृत जैसा है। जैसे शरीर को भोजन चाहिए, वैसे ही हृदय को दिव्य कथा, नाम-संकीर्तन और सत्संग की ध्वनि चाहिए। यह मार्ग किसी एक जाति, भाषा, देश या पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है। चाहे आप नए हों, जिज्ञासु हों, किसी धर्म से जुड़े हों या बस जीवन में शांति खोज रहे हों—श्रवणम आपके लिए एक सरल और शक्तिशाली आध्यात्मिक अभ्यास बन सकता है।
श्रवणम भक्ति योग के नौ प्रमुख अंगों में पहला अंग माना गया है। श्रीमद्भागवतम में भक्त प्रह्लाद महाराज ने भक्ति के नौ रूप बताए हैं—श्रवणम, कीर्तनम, विष्णोः स्मरणम, पादसेवनम, अर्चनम, वंदनम, दास्यम, सख्यम और आत्मनिवेदनम। इनमें श्रवणम को सबसे पहले रखा गया है, क्योंकि सुनने से ही भक्ति का बीज हृदय में प्रवेश करता है।
श्रवणम का सरल अर्थ
श्रवणम का अर्थ है भगवान और आध्यात्मिक सत्य के विषय में सुनना। इसमें शामिल हो सकता है:
- भगवान के पवित्र नामों का कीर्तन सुनना
- श्रीमद्भागवतम, भगवद्गीता या रामायण की कथाएँ सुनना
- संतों और भक्तों के जीवन से प्रेरणा लेना
- किसी गुरु, साधु या अनुभवी भक्त की शिक्षाओं को विनम्रता से सुनना
- अपने भीतर की प्रार्थना और अंतरात्मा की पुकार को सुनना
यह सुनना केवल जानकारी पाने के लिए नहीं है। यह संबंध बनाने के लिए है। भक्ति योग में भगवान कोई दूर का सिद्धांत नहीं हैं; वे हमारे सबसे प्रिय, सबसे करुणामय और सबसे निकट संबंधी हैं। श्रवणम उस दिव्य संबंध को फिर से जगाता है।
सुनना क्यों परिवर्तन करता है?
हम जो सुनते हैं, वह हमारे विचार बनाता है। विचार हमारी भावनाएँ बनाते हैं। भावनाएँ हमारे कर्म बनाती हैं। और कर्म हमारी दिशा बनाते हैं। यदि हम दिन भर भय, तुलना, क्रोध और चिंता की बातें सुनते हैं, तो हृदय भारी हो जाता है। पर यदि हम भगवान के नाम, प्रेम, करुणा और शाश्वत सत्य को सुनते हैं, तो भीतर प्रकाश बढ़ने लगता है।
श्रवणम का चमत्कार यही है कि यह धीरे-धीरे हृदय की धूल साफ करता है। किसी पर दबाव नहीं डालता, किसी को छोटा नहीं करता, बस भीतर से जागरण देता है। भक्ति में परिवर्तन प्रेम से होता है, और श्रवणम उस प्रेम की पहली किरण है।
शास्त्रों में श्रवणम की महिमा
भक्ति साहित्य में श्रवणम को बहुत ऊँचा स्थान मिला है। यह कोई आधुनिक विचार नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चले आ रहे भक्तों के अनुभव का सार है।
श्रीमद्भागवतम का संदेश
श्रीमद्भागवतम में कहा गया है कि भगवान की कथा सुनने से हृदय की अशुद्धियाँ दूर होती हैं। वहाँ एक सुंदर भाव आता है कि जब कोई श्रद्धा से भगवान की कथाएँ सुनता है, तो भगवान स्वयं उसके हृदय में बैठकर अवांछित इच्छाओं को साफ करते हैं।
यह बात बहुत सांत्वना देने वाली है। हमें अपने आप को पूरी तरह “योग्य” बनाकर ही आध्यात्मिक मार्ग पर आने की आवश्यकता नहीं है। हम जैसे हैं, वैसे ही आ सकते हैं। श्रवणम करते-करते मन शुद्ध होता है, दृष्टि बदलती है, और भक्ति स्वाभाविक रूप से बढ़ती है।
भगवद्गीता में सुनने की भूमिका
भगवद्गीता मूल रूप से एक दिव्य संवाद है। अर्जुन सुनते हैं, श्रीकृष्ण बोलते हैं। अर्जुन पहले उलझन, दुख और भ्रम में हैं। पर जब वे विनम्र होकर कहते हैं, “मैं आपका शिष्य हूँ, कृपया मुझे शिक्षा दीजिए,” तब परिवर्तन शुरू होता है।
यह हमें सिखाता है कि सच्चा श्रवण विनम्रता से शुरू होता है। जब हम मान लेते हैं कि मुझे मार्गदर्शन चाहिए, कि मेरे मन की हर आवाज अंतिम सत्य नहीं है, तब कृपा के द्वार खुलते हैं।
भक्तों की परंपरा में श्रवण
भारत की भक्ति परंपरा में संतों ने हमेशा कथा, कीर्तन और सत्संग को महत्व दिया। मीरा बाई ने श्रीकृष्ण के नाम और लीलाओं को सुन-सुनकर प्रेम में जीवन समर्पित किया। चैतन्य महाप्रभु ने हरिनाम संकीर्तन—भगवान के नामों का सामूहिक गान—को युगधर्म बताया। तुलसीदास जी ने रामकथा को जन-जन तक पहुँचाया ताकि हर हृदय में राम का प्रेम जागे।
इन सभी भक्तों का संदेश सरल है: सुनो, गाओ, स्मरण करो, सेवा करो—और प्रेम में बढ़ो।
श्रवणम और हृदय की शुद्धि

भक्ति योग में “हृदय की शुद्धि” का अर्थ बाहरी पूर्णता नहीं है। इसका अर्थ है भीतर की कठोरता, ईर्ष्या, अहंकार, भय और भ्रम का धीरे-धीरे कम होना। श्रवणम इस प्रक्रिया को बहुत कोमलता से करता है।
मन की दिशा बदलना
मन स्वभाव से चंचल है। वह अतीत में पछताता है और भविष्य में डरता है। पर जब हम भगवान की कथा सुनते हैं, तो मन को एक पवित्र दिशा मिलती है। वह केवल समस्याओं के चक्कर में नहीं घूमता, बल्कि आशा और भक्ति की ओर मुड़ता है।
श्रवणम मन को दबाता नहीं, उसे उच्च स्वाद देता है। जैसे कोई व्यक्ति कड़वी आदत छोड़ना चाहता है, तो केवल मना करने से वह नहीं छूटती। पर जब उसे बेहतर स्वाद मिल जाए, तो पुरानी आदत अपने आप कम होने लगती है। भगवान का नाम और कथा वही उच्च स्वाद है।
अहंकार को नरम करना
अहंकार कहता है, “मैं सब जानता हूँ।” श्रवणम कहता है, “मैं सीखने के लिए तैयार हूँ।” यह विनम्रता कमजोरी नहीं है; यह आध्यात्मिक शक्ति है। जब हम किसी संत, शास्त्र या सच्चे भक्त की बात ध्यान से सुनते हैं, तो भीतर जगह बनती है। उस जगह में कृपा उतरती है।
कभी-कभी एक ही वाक्य जीवन बदल देता है। कोई कथा, कोई कीर्तन की पंक्ति, कोई साधु का सरल उदाहरण—और हृदय में नई समझ आ जाती है। यही श्रवणम की शक्ति है।
भावनाओं को पवित्र करना
जीवन में दुख, हानि, तनाव और अकेलापन आ सकता है। श्रवणम इन भावनाओं को नकारता नहीं, बल्कि उन्हें भगवान के चरणों की ओर मोड़ता है। जब हम सुनते हैं कि भक्तों ने भी कठिनाइयों में भगवान को पुकारा, तो हमें साहस मिलता है।
प्रह्लाद महाराज ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान का स्मरण किया। कुंती महारानी ने कष्टों में भी श्रीकृष्ण की शरण ली। इन कथाओं को सुनकर हमें समझ आता है कि भक्ति केवल सुख के दिनों की चीज़ नहीं है; यह हर परिस्थिति में भगवान से संबंध का मार्ग है।
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श्रवणम का अभ्यास कैसे करें?

श्रवणम बहुत सरल है, पर उसकी गहराई असीम है। इसे शुरू करने के लिए किसी बड़े आयोजन या विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं। एक छोटा, सच्चा कदम पर्याप्त है।
प्रतिदिन कुछ समय पवित्र श्रवण के लिए रखें
दिन में 10 से 20 मिनट भी बहुत प्रभावशाली हो सकते हैं। आप सुबह उठकर या रात को सोने से पहले भगवद्गीता का एक श्लोक और उसका सरल अर्थ सुन सकते हैं। आप श्रीमद्भागवतम की कथा सुन सकते हैं। आप हरिनाम कीर्तन सुन सकते हैं।
महत्वपूर्ण यह है कि समय को प्रेम से दें, मजबूरी से नहीं। जैसे हम किसी प्रिय मित्र से मिलने के लिए समय निकालते हैं, वैसे ही भगवान की वाणी और नाम को सुनने के लिए समय दें।
सुनते समय मन को कोमल रखें
कभी-कभी हम सुनते हुए भी भीतर बहस करते रहते हैं। “यह मेरे लिए है या नहीं? यह सही है या गलत? मुझे पहले से पता है।” विवेक आवश्यक है, पर भक्ति का श्रवण केवल बौद्धिक विश्लेषण नहीं है। इसमें विनम्र ग्रहणशीलता चाहिए।
आप भीतर प्रार्थना कर सकते हैं: “हे भगवान, जो मेरे हृदय के लिए कल्याणकारी है, कृपया उसे मुझे समझाइए। मुझे सत्य को प्रेम से सुनने की शक्ति दीजिए।”
प्रामाणिक स्रोतों से सुनें
आध्यात्मिक संसार में बहुत सारी बातें उपलब्ध हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम ऐसे स्रोतों से सुनें जो शास्त्र, गुरु-परंपरा और भक्ति के सिद्धांतों पर आधारित हों। प्रामाणिक श्रवण हमें भगवान की ओर ले जाता है, अहंकार, भ्रम या भय की ओर नहीं।
भगवद्गीता, श्रीमद्भागवतम, रामायण, चैतन्य चरितामृत और संतों के भजन विश्वसनीय भक्ति स्रोत हैं। इनके साथ-साथ ऐसे भक्तों की संगति में सुनना उपयोगी है, जिनका जीवन सेवा, करुणा और नाम-स्मरण से जुड़ा हो।
श्रवणम और कीर्तन: सुनना और गाना साथ-साथ
भक्ति योग में श्रवणम और कीर्तनम गहराई से जुड़े हैं। कीर्तनम का अर्थ है भगवान के नाम, गुण और महिमा का गान या वर्णन। जब कोई कीर्तन करता है, तो अन्य लोग श्रवण करते हैं। और जब हम सुनते-सुनते नाम गाने लगते हैं, तो हमारा हृदय और भी खुलता है।
हरिनाम की शक्ति
“हरिनाम” का अर्थ है भगवान का पवित्र नाम। जैसे हरे कृष्ण महा-मंत्र:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे
यह मंत्र एक प्रेममयी पुकार है। “हरे” भगवान की दिव्य शक्ति को संबोधित करता है। “कृष्ण” का अर्थ है सर्व-आकर्षक भगवान, और “राम” का अर्थ है आनंद के स्रोत। इस मंत्र में हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे हमें अपनी प्रेममयी सेवा में लगा लें।
जब हम इस मंत्र को सुनते हैं, तो केवल ध्वनि नहीं सुनते; हम भगवान की उपस्थिति को अपने हृदय में आमंत्रित करते हैं।
सामूहिक कीर्तन में श्रवण
जब भक्त मिलकर कीर्तन करते हैं, तो वातावरण बदल जाता है। कोई बहुत अच्छा गायक हो या न हो, यह सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं। भक्ति में मुख्य चीज़ है sincerity—सच्चाई और प्रेम। सामूहिक कीर्तन में हम एक-दूसरे की भक्ति सुनते हैं, प्रेरित होते हैं और याद करते हैं कि आध्यात्मिक यात्रा अकेले चलने की आवश्यकता नहीं है।
यदि आप किसी भक्ति केंद्र, सत्संग या मंदिर में जा सकते हैं, तो कभी कीर्तन में बैठकर केवल सुनिए। आँखें बंद कर लीजिए, गहरी साँस लीजिए, और नाम को हृदय तक जाने दीजिए। यह अनुभव बहुत कोमल और उपचारकारी हो सकता है।
आधुनिक जीवन में श्रवणम की आवश्यकता
आज का जीवन शोर से भरा है। फोन की सूचनाएँ, समाचार, सोशल मीडिया, काम का दबाव, संबंधों की जटिलता—हम लगातार कुछ न कुछ सुन रहे हैं। पर क्या वह सुनना हमें शांत करता है? क्या वह हमें प्रेममय बनाता है? क्या वह हमें भगवान के निकट ले जाता है?
श्रवणम आधुनिक जीवन में आध्यात्मिक संतुलन देता है।
डिजिटल युग में पवित्र ध्वनि
यदि फोन हमारे मन को भटका सकता है, तो वही फोन भक्ति का साधन भी बन सकता है। आप यात्रा करते समय कीर्तन सुन सकते हैं। घर का काम करते हुए भक्तिमय प्रवचन सुन सकते हैं। सुबह व्यायाम के बाद गीता का एक छोटा पाठ सुन सकते हैं।
प्रश्न यह नहीं कि हमारे पास साधन हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि हम अपनी श्रवण शक्ति को किस दिशा में लगा रहे हैं।
चिंता और तनाव में श्रवणम
जब मन बहुत चिंतित हो, तब लंबे दार्शनिक विचार तुरंत समझ में नहीं आते। ऐसे समय में भगवान का नाम सुनना बहुत सहायक होता है। कीर्तन, मंत्र-जप या शांत भजन मन को धीरे-धीरे स्थिर करते हैं।
श्रवणम हमें याद दिलाता है: “मैं अकेला नहीं हूँ। भगवान मेरे साथ हैं। मेरी परिस्थिति कठिन हो सकती है, पर मैं दिव्य प्रेम से कटा हुआ नहीं हूँ।”
परिवार और बच्चों के साथ श्रवण
श्रवणम परिवार में भी प्रेम और पवित्रता ला सकता है। बच्चों को सरल रूप में कृष्ण, राम, हनुमान, प्रह्लाद, ध्रुव, मीरा और संतों की कहानियाँ सुनाई जा सकती हैं। ये कथाएँ केवल धार्मिक कहानी नहीं हैं; इनमें साहस, सत्य, दया, सेवा और भगवान पर भरोसा जैसे जीवन-मूल्य छिपे हैं।
परिवार में सप्ताह में एक बार भजन सुनना, गीता का एक श्लोक पढ़ना, या साथ में 5 मिनट मंत्र सुनना भी सुंदर शुरुआत है।
श्रवणम से सेवा और चरित्र का विकास
सच्चा श्रवण केवल कानों तक सीमित नहीं रहता। वह जीवन में उतरता है। यदि हम भगवान की कथा सुनते हैं, पर दूसरों के प्रति कठोर हो जाते हैं, तो हमें अपने श्रवण को और विनम्र बनाने की आवश्यकता है। भक्ति का श्रवण हमें सेवा, करुणा और नम्रता की ओर ले जाता है।
सुनना और सेवा करना
जब हम सुनते हैं कि भगवान हर जीव के हृदय में परमात्मा रूप से उपस्थित हैं, तो हमारी दृष्टि बदलती है। हम दूसरों को उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि भगवान के प्रिय अंश के रूप में देखने लगते हैं। यही दृष्टि सेवा को जन्म देती है।
सेवा का अर्थ केवल मंदिर में बड़ा कार्य करना नहीं। किसी को प्रेम से भोजन देना, ध्यान से किसी की बात सुनना, घर में जिम्मेदारी निभाना, समाज में ईमानदारी से काम करना, प्रकृति का सम्मान करना—ये सब भक्ति की भावना से सेवा बन सकते हैं।
वाणी का शुद्ध होना
जो व्यक्ति पवित्र बातें सुनता है, उसकी वाणी भी धीरे-धीरे पवित्र होने लगती है। वह कम शिकायत करता है, कम निंदा करता है, और अधिक प्रोत्साहित करता है। भक्ति योग में वाणी का बड़ा महत्व है, क्योंकि वाणी से हम नाम का कीर्तन कर सकते हैं और वाणी से ही किसी का हृदय दुखा भी सकते हैं।
श्रवणम हमें सिखाता है कि जैसे हम दिव्य ध्वनि सुनना चाहते हैं, वैसे ही हमें अपनी वाणी को भी दिव्य और दयालु बनाना चाहिए।
कठिन परिस्थितियों में धैर्य
श्रवणम से भीतर एक आध्यात्मिक स्मृति बनती है। जब जीवन में चुनौती आती है, तो सुनी हुई कथाएँ और नाम भीतर से सहारा देते हैं। अचानक हमें याद आता है कि ध्रुव महाराज ने अपमान के बाद भगवान की शरण ली। पांडवों ने कठिनाइयों में भी कृष्ण को नहीं छोड़ा। गोपियों ने विरह में भी कृष्ण का स्मरण किया।
इन कथाओं से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि भक्ति का मार्ग जीवन से भागना नहीं, बल्कि भगवान के साथ जीवन को जीना है।
श्रवणम में आने वाली चुनौतियाँ और उनका समाधान
किसी भी साधना की तरह श्रवणम में भी बाधाएँ आ सकती हैं। पर उन्हें देखकर निराश होने की आवश्यकता नहीं। भक्ति में प्रगति धीरे-धीरे, प्रेम से होती है।
मन का भटकना
कथा सुनते समय मन इधर-उधर चला जाता है। यह सामान्य है। मन वर्षों से बाहरी विषयों में घूमता रहा है; उसे तुरंत स्थिर होने की उम्मीद न करें। जब ध्यान भटके, तो कोमलता से वापस सुनने पर आएँ। अपने आप को दोष न दें।
श्रवणम में एक छोटी प्रार्थना करें: “हे प्रभु, मेरा मन चंचल है, पर मैं आपकी ओर लौटना चाहता हूँ।”
नियमितता की कमी
कई लोग उत्साह से शुरू करते हैं, फिर रुक जाते हैं। इसका समाधान है—छोटा संकल्प। प्रतिदिन 10 मिनट। सप्ताह में एक सत्संग। दिन में एक भजन। छोटा पर नियमित अभ्यास बड़े अनियमित प्रयास से अधिक शक्तिशाली होता है।
केवल मनोरंजन समझ लेना
भक्ति कथा मधुर होती है, कीर्तन आनंदमय होता है, पर श्रवणम केवल मनोरंजन नहीं है। यह आत्मा का पोषण है। इसलिए सुनने के बाद थोड़ा चिंतन करें: “आज मैंने क्या सीखा? इसे अपने जीवन में कैसे लागू कर सकता हूँ? मेरी प्रार्थना क्या है?”
श्रवणम का आंतरिक फल
श्रवणम का फल तुरंत भी मिल सकता है और धीरे-धीरे भी। कभी एक कीर्तन सुनकर ही आँसू आ जाते हैं। कभी महीनों तक कुछ विशेष अनुभव नहीं होता, पर भीतर गहरा परिवर्तन चल रहा होता है।
भगवान के प्रति आकर्षण
श्रवणम का सबसे सुंदर फल है भगवान के प्रति आकर्षण। पहले जो बातें दूर लगती थीं, वे धीरे-धीरे प्रिय लगने लगती हैं। नाम सुनना अच्छा लगता है। कथा में रस आने लगता है। मन पूछता है—“कृष्ण कौन हैं? राम का प्रेम कैसा है? मैं भगवान से अपना संबंध कैसे गहरा करूँ?”
यह आकर्षण कृपा है। इसे सँभालकर रखें।
जीवन में उद्देश्य
श्रवणम हमें याद दिलाता है कि हम केवल शरीर, नौकरी, संबंध और उपलब्धियों तक सीमित नहीं हैं। हम आत्मा हैं—भगवान के अंश, प्रेम के लिए बने हुए। जब यह समझ आती है, तो जीवन में गहराई आती है। हम अपने कर्तव्यों से भागते नहीं, बल्कि उन्हें भगवान की सेवा की भावना से करने लगते हैं।
प्रेम की वृद्धि
भक्ति योग का लक्ष्य प्रेम है—भगवान के प्रति प्रेम और भगवान से जुड़े सभी जीवों के प्रति करुणा। श्रवणम इस प्रेम को जगाता है। धीरे-धीरे हृदय कठोरता से कोमलता की ओर, भय से भरोसे की ओर, और स्वार्थ से सेवा की ओर बढ़ता है।
एक सरल दैनिक श्रवणम साधना
यदि आप आज से शुरू करना चाहते हैं, तो यह छोटा अभ्यास अपना सकते हैं।
सुबह का आरंभ
सुबह उठकर 5 से 10 मिनट भगवान का नाम सुनें या जप करें। यदि संभव हो, हरे कृष्ण महा-मंत्र या कोई प्रिय भजन चलाएँ। मन में कहें: “आज का दिन आपकी सेवा में समर्पित हो।”
दिन में एक शास्त्र-वाणी
भगवद्गीता का एक श्लोक और उसका अर्थ सुनें या पढ़ें। कठिन शब्दों से डरें नहीं। धीरे-धीरे अर्थ खुलता है। संस्कृत शब्दों को प्रेम से समझें। “योग” का अर्थ जोड़ना है, “भक्ति” का अर्थ प्रेमपूर्ण सेवा है, और “कृष्ण” का अर्थ सर्व-आकर्षक भगवान है।
रात की कृतज्ञता
रात को सोने से पहले 5 मिनट शांत होकर कोई भजन सुनें। दिन में जो भी हुआ, उसे भगवान को अर्पित करें। तीन बातों के लिए धन्यवाद दें। यह अभ्यास हृदय को नरम और शांत करता है।
सभी के लिए खुला प्रेम का मार्ग
श्रवणम की अद्भुत शक्ति यह है कि यह हर किसी के लिए उपलब्ध है। आपको विद्वान होने की आवश्यकता नहीं। आपको संस्कृत जानने की आवश्यकता नहीं। आपको किसी विशेष सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने की आवश्यकता नहीं। आपको बस थोड़ा-सा खुला हृदय, थोड़ा-सा समय और थोड़ी-सी सच्चाई चाहिए।
भक्ति योग कोई कठोर प्रदर्शन नहीं है। यह प्रेम का मार्ग है—सुनने, गाने, प्रार्थना करने, सेवा करने और धीरे-धीरे आध्यात्मिक रूप से बढ़ने का मार्ग। भगवान हमारे प्रयास की मात्रा से अधिक हमारे हृदय की भावना देखते हैं।
यदि आज आप केवल एक मंत्र सुनते हैं, एक कथा का एक अंश सुनते हैं, एक सच्ची प्रार्थना करते हैं—तो यह भी मूल्यवान है। भक्ति में कोई छोटा कदम छोटा नहीं होता, जब वह प्रेम और sincerity से लिया जाए।
आप जहाँ भी हैं, जैसे भी हैं, भगवान की ओर एक कदम बढ़ा सकते हैं। श्रवणम से शुरुआत करें। सुनें—क्योंकि दिव्य प्रेम की ध्वनि पहले से ही आपको पुकार रही है। सभी का स्वागत है कि वे आज एक sincere, सच्चा कदम भगवान की ओर बढ़ाएँ।
FAQs
1. Sravanam kya hai?
Sravanam ek dharmik pratha hai jisme shishya guru ke shabdon ko sunta hai aur unki shikshaon ko samajhta hai.
2. Sravanam ka mahatva kya hai?
Sravanam ka mahatva bahut adhik hai kyunki isse shishya guru ki shikshaon ko samajhne aur apnane ki kshamata prapt karta hai.
3. Sravanam kaise kiya jata hai?
Sravanam karne ke liye shishya ko guru ke shabdon ko dhyan se sunna chahiye aur unhe samajhne ki koshish karni chahiye.
4. Sravanam ke kya fayde hote hain?
Sravanam se shishya ki buddhi vikasit hoti hai aur usse sahi aur galat ke beech antar samajhne ki kshamata milti hai.
5. Sravanam ka kya uddeshya hota hai?
Sravanam ka uddeshya guru ki shikshaon ko samajhkar unhe apnana hota hai taki shishya apne jeevan mein un shikshaon ka anushasan kar sake.


